2017 रहा दूरसंचार के लिए क्रांतिकारी

2017 रहा दूरसंचार के लिए क्रांतिकारी

भारत के इतिहास में वर्ष 2017 को जिन घटनाओं के लिए याद किया जाएगा उनमें सबसे आगे जीएसटी का नाम होगा। आजादी के बाद सबसे बड़े कर सुधार करार दिए गए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का एक जुलाई 2017 से आगाज हुआ। 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के बाद यह पहला ऐसा सुधार था जिसने समाज और कारोबार जगत में सभी लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित किया।

जीएसटी
एक राष्ट्र, एक कर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब मध्य रात्रि को संसद के केंद्रीय कक्ष से जीएसटी के शुभारंभ की घोषणा की तो इसे ‘गुड एवं सिंपल टैक्स’ करार दिया। हालांकि जैसे जैसे जमीनी स्तर पर इसका क्रियान्‍वयन आगे बढ़ा, तकनीकी खामियों से व्यापारी और कारोबारी वर्ग को दिक्कतें होने लगीं। हालात यहां तक पहुंच गए कि विपक्ष ने इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया और कांग्रेस उपाध्यक्ष ने तो जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ तक करार दिया। बहरहाल जीएसटी के लागू होने के बाद केंद्र और राज्यों के एक दर्जन से अधिक टैक्स समाप्त हो गए। पेट्रोलियम उत्पादों और शराब को छोड़़ सभी उत्पादों पर देश में एक समान कर हो गया।

जीएसटी का एक प्रभाव यह भी रहा कि इससे देश के संघीय ढांचे के अनुरूप एक नई कार्यशैली विकसित हुई। इस टैक्स के बारे में महत्वपूर्ण फैसले लेने को जीएसटी काउंसिल बनी जिसके अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री हैं। काउंसिल की अब तक करीब दो दर्जन बैठकें हुई हैं और इसमें अलग-अलग राजनीतिक दलों के शासन वाले राज्यों के वित्त मंत्रियों के शामिल होने के बावजूद सभी निर्णय आम राय से हुए हैं। एक अच्छी बात यह भी है कि जीएसटी में सुधार और बदलाव का सिलसिला कायम है।

वैसे तो किसी भी वित्त मंत्री का काम कभी भी आराम का नहीं रहता, लेकिन इस वर्ष में बतौर वित्त मंत्री अरुण जेटली का कार्यकाल जितनी गतिविधियों वाला रहा वैसा बहुत ही कम देखने को मिलता है। साल की शुरुआत नोटबंदी के कोहराम और पूरे देश में मची अफरा-तफरी से हुई थी। एक तरफ एटीएम और बैंकों पर लोगों की लंबी कतारें लगी हुई थीं तो दूसरी तरफ नकदी के अभाव में तमाम उद्योगों की सांसें फूली हुई थीं। तब जेटली ने वित्त मंत्रालय, पीएमओ, आरबीआइ, नोट मुद्रित करने वाली कंपनियों, आय कर विभाग जैसी एक दर्जन सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल बिठाने का काम किया। हालात को संभालने में कुछ देर लगी, लेकिन जेटली के इस भगीरथ प्रयास को अब आइएमएफ, विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां ऐतिहासिक मान रही हैं। इसके कुछ ही दिनों बाद जेटली ने जीएसटी लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। विरोध और तमाम शुरुआती दिक्कतों के बीच जेटली इसके सकारात्मक प्रभाव को उभारने में सफल रहे।

वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर के पिछले पांच वर्षों के न्यूनतम स्तर पर चले जाने के लिए जीएसटी को भी जिम्मेदार माना गया, लेकिन इसके कुछ ही दिनों पर अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कई वर्षों बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की रेटिंग को बढ़ा कर जेटली के साथ ही सरकार को भी राहत की सांस दी। हालांकि घरेलू अर्थव्यवस्था अभी भी कई सारी चुनौतियों से जूझ रही है।औद्योगिक क्षेत्र में ठोस सुधार के लक्षण नहीं दिख रहे। फंसे कर्जे (एनपीए) में उलझे सरकारी बैंकों की स्थिति कब सुधरेगी, यह भी लाख टके का सवाल बना हुआ है। किसानों की स्थिति भी सुखद नहीं है। सालाना दो करोड़ रोजगार देने का वादा कर सत्ता में आई संप्रग सरकार को इस मोर्चे पर भी तल्ख हकीकत का सामना करना पड़ रहा है। जाहिर है कि अगले वर्ष के लिए वित्त मंत्री जेटली को इस वर्ष से भी ज्यादा मेहनत करनी होगी।

ई-वॉलेट – कैश से डिजिटल की ओर

खरीददारी से लेकर बिलों के नकद भुगतान की जो आदत लोगों में बरसों से नहीं बदली थी उसे नोटबंदी ने बीते एक साल में काफी हद तक बदल दिया। लोगों के भुगतान की इस आदत को बदलने में देश को डिजिटल इंडिया में तब्दील करने के प्रयासों का योगदान भी काफी ज्यादा रहा। बीते एक साल में मोबाइल से भुगतान करने की सुविधा भी काफी ज्यादा बढ़ी। ई-वॉलेट्स और पेमेंट बैंकों के साथ-साथ सरकार के ‘यूपीआई’ और ‘भीम’ एप ने कैशलेस इकोनॉमी की राह को बेहद आसान बनाया। यही वजह है कि 8 नवंबर, 2016 को एक हजार और पांच सौ रुपये के नोट अवैध घोषित होने के बाद डिजिटल लेनदेन की संख्या डेढ़ गुना बढ़ गई। लोगों के रुख में आए इस बदलाव की झलक डिजिटल पेमेंट के आंकड़ों से मिलती है।

नोटबंदी के ऐलान से पहले अक्टूबर 2016 में 70.21 करोड़ सौदे डिजिटल लेनदेन के जरिए हुए थे। इन लेनदेन में क्रेडिट और डेबिट कार्ड से होने वाले भुगतान के अलावा ऑनलाइन बैंकिंग के आंकड़े भी शामिल थे, लेकिन आइटी मंत्रालय के आंकड़ों की मानें तो करीब नौ महीने बाद जुलाई 2017 में डिजिटल लेनदेन के सौदों की यह संख्या 113 करोड़ तक पहुंच गई। यानी डिजिटल माध्यमों से लेनदेन करने के मामलों में 60 फीसद इजाफा हुआ। पेमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक डिजिटल लेनदेन के सौदों की वृद्धि दर जहां नोटबंदी से पहले 20-50 फीसद के आस-पास रहती थी वह नोटबंदी के बाद 40-70 फीसद के आस-पास रही। दरअसल, भुगतान का यह तरीका इतना सुविधाजनक है कि अधिकतर लोग खासकर युवा वर्ग में अब नकदी का मोह खत्म हो रहा है। सरकार ने डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए नोटबंदी के बाद काफी इंसेंटिव भी दिए, जिसके चलते काफी लोगों ने भुगतान की इस नई व्यवस्था के साथ खुद को जोड़ा।

सस्ती हवाई यात्रा – अब उड़ो, जहां चाहो

सस्ती हवाई यात्रा का सपना देखने वाले लोगों के लिए यह वर्ष अत्यंत उत्साहवर्धक रहा। रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम ‘उड़ान’ (उड़े देश का आम नागरिक) उनकी इस चाहत को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। इस स्कीम के तहत एक घंटे की विमान यात्रा अथवा आधे घंटे की हेलीकॉप्टर यात्रा के लिए लोगों को केवल 2500 रुपये का किराया देना होगा। इसके लिए सरकार एयरलाइंस को सब्सिडी प्रदान करेगी। हालांकि स्कीम अभी शैशव काल में है और केवल पहले चरण के 128 रूटों और 45 नये हवाई अड्डों के साथ 5 एयरलाइन (एयर ओडिशा, एलायंस एयर, एयर डेक्कन, स्पाइसजेट और टर्बो मेघा) का चयन हुआ है।

कुछ रूट पर उड़ानें भी शुरू हुईं और अब दूसरे चरण के रूटों, हवाई अड्डों और एयरलाइन्स के एलान के साथ इसके रफ्तार पकडऩे की उम्मीद है। इसमें हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर तथा अंडमान-निकोबार जैसे सुदूर और पर्वतीय राज्यों के लिए किफायती उड़ानों का पिटारा खुलेगा। स्कीम से देश के विमानन क्षेत्र को एक नई छलांग मिलेगी, क्योंकि इससे अनेक छोटी एयरलाइंस के उदय के अलावा छोटे शहरों के उपेक्षित हवाई अड्डों के पुनरुद्धार, पुनर्विकास और विस्तार के दरवाजे खुलेंगे। ‘उड़ान’ से देश में मल्टीमोडल यातायात को भी बढ़ावा मिलेगा।

सडक़, रेल और जल परिवहन के साधनों के बीच प्रतिस्पर्धा बढऩे से अंतत: आवागमन की लागत घटेगी और अर्थव्यवस्था को लाभ होगा। देश में पहली बार घरेलू हवाई यात्रियों का आंकड़ा एक साल में 10 करोड़ को पार कर गया है। अकेले नवंबर माह में यह संख्‍या 17 फीसदी बढ़कर एक करोड़ पांच लाख तक पहुंच गई। हालांकि यात्रियों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर हवाईअड्डों की ढांचागत व्यवस्था को अपग्रेड करना एक चुनौती है।

मोबाइल डेटा – ग्राहक बना विजेता

दूरसंचार क्षेत्र के लिए यह साल क्रांतिकारी साबित हुआ। मोबाइल कम्यूनिकेशन के विस्तृत आकाश में रिलायंस जियो के उदय ने भारती एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया जैसी नामी कंपनियों के पैरों तले जमीन खिसका दी। जियो ने वॉयस के साथ-साथ मुफ्त डेटा का ऐसा चारा फेंका कि बाकी सारे तालाबों की करोड़ों मछलियां जियो के जाल में फंस गईं। अपने ग्राहक आधार को बचाने और पुन: स्थापित करने के लिए आखिरकार सभी कंपनियों को जियो की राह पकडऩी पड़ी। शुरू में कंपनियों ने जियो के लुभाऊ प्रस्तावों का विरोध किया और सरकार और ट्राई से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन बात न बनते देख आखिरकार सीधे मुकाबले का निर्णय लिया। नतीजतन जैसे-जैसे जियो का तूफान धीमा पड़ा, एयरटेल और वोडाफोन जैसी कंपनियों के ग्राहक उनके पास वापस आने लगे हैं। दूरसंचार क्षेत्र के इस महासंग्राम से जहां देश में इंटरनेट और ब्रॉडबैंड सेवाओं का विस्तार हुआ, वहीं डेटा संचार की कीमत घटने से ग्राहक विजेता बनकर उभरा।

सालभर पहले तक जहां मोबाइल पर वीडियो या फिल्म डाउनलोड-अपलोड करना सिरदर्द के साथ खर्चीला अनुभव होता था, वहीं अब लोग चौबीसों घंटे अपने मनपसंद वीडियो यूट्यूब पर देख ही नहीं रहे बल्कि वॉट्सएप, ट्विटर और फेसबुक पर अपलोड कर रहे हैं। वॉयस और डेटा की कीमत लगभग न के बराबर हो गई है।

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