मीडिया क्षेत्र के लिए एक नई उम्मीद है जीएसटी

मीडिया क्षेत्र के लिए एक नई उम्मीद है जीएसटी

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का ऐतिहासिक शुभारंभ को हुए दो महीने हो गए। जीएसटी का पहला महीना आसान रहा और बिना किसी बड़ी समस्या के गुज़र गया। यह मुख्य रूप से भारतीय दिमाग के उद्यमी चरित्र के कारण संभव हुआ जिसने कई समस्याओं का जवाब ढूँढ़ लिया। केंद्र सरकार ने भी नई प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का पूरी तरह से पालन न किए जाने पर भी निर्यात को अनुमति देने, तेज गति से स्पष्टीकरण उपलब्ध कराने, सोशल मीडिया टूल के साथ-साथ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से सूचना का प्रसार करने आदि जैसे कुछ साहसिक फैसले लिए। हालांकि, भारतीय व्यवसायों के संचालन में गति बढ़ने के साथ अगस्त महीने के दौरान इस परिदृश्य में बदलाव आया। जैसे-जैसे कारोबार ने इस पड़ाव को पार किया, हमें जीएसटी के कार्यान्वयन में समस्याएँ नज़र आने लगी, क्योंकि व्यवसाय वर्ग के अधिकांश ने 1 सितंबर, 2017 से रिटर्न भरना शुरू किया।

मीडिया क्षेत्र

भारत दुनिया भर में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले और सबसे तेजी से बढ़ते विज्ञापन बाज़ारों में से एक है। हालांकि, हाल के दिनों में, मीडिया क्षेत्र में कमजोर कारोबारी माहौल के कारण कम विज्ञापन राजस्व प्राप्त किया गया और खुदरा क्षेत्र को सीधी सेवाएँ देने वाली कंपनियों ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के कार्यान्वयन से पहले बाजार हिस्सेदारी को बनाए रखने के लिए अधिक से अधिक छूट की पेशकश की है।

जीएसटी के कार्यान्वयन से पता चला है कि विज्ञापन व्यय, खासकर एफएमसीजी और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक प्रभावित हुआ है। वर्ष 2016 में, भारत के सभी क्षेत्रों में विज्ञापन पर कुल व्यय 8.18 अरब डॉलर था और 2020 तक 16.7 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।

इस त्यौहार के मौसम की शुरुआत के साथ, हम खुदरा विज्ञापनों में अच्छी वृद्धि देख सकते हैं, क्योंकि कंपनियों द्वारा विज्ञापनों पर अधिक व्यय किए जाने की संभावना है और वे इस तरह साल की पहली छमाही में कमी को पूरा कर सकती हैं। इस साल बेहतर मानसून, सातवें वेतन आयोग और अन्य सकारात्मक तत्वों के साथ, उपभोक्ता मांग के विशेष रूप से ग्रामीण भारत, जहाँ आम तौर पर अधिक बिक्री और विज्ञापन देखी जाती है, में बढ़ने की उम्मीद है।

उद्योग प्रमुखों का मानना ​​है कि ई-कॉमर्स, खाद्य और पेय खंड में नए खिलाड़ियों के प्रवेश, बैंकिंग और वित्त ऑटोमोटिव खिलाड़ियों, मोबाइल कंपनियों और सरकारी क्षेत्र से अधिक व्यय होने की सम्भावना है।

साल 2014 से, मोदी सरकार ने केबल वितरण क्षेत्र के डिजिटलीकरण जैसी विभिन्न पहलों के माध्यम से अधिक संस्थागत वित्त पोषण को आकर्षित किया और डिजिटल इंडिया, स्मार्ट शहर निर्माण, मेक इन इंडिया जैसे अन्य रिफार्म के अलावा केबल और डीटीएच सैटेलाईट प्लेटफार्मों में एफडीआई सीमा को 74 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत करते हुए क्षेत्र में वृद्धि का समर्थन किया।

डीआईपीपी के अनुसार, अप्रैल 2000 से मार्च 2017 की अवधि के दौरान सूचना और प्रसारण (आई और बी) सेक्टर ने (प्रिंट मीडिया सहित) में 6.49 बिलियन डॉलर का एफडीआई प्राप्त किया।

भारत में मीडिया को अर्थव्यवस्था का एक सूर्योदय क्षेत्र माना जाता है और उपभोक्ता मांग और विज्ञापन राजस्व में बढ़ोतरी के साथ, यह विकास के एक मजबूत चरण पर मौजूद है। लगभग सभी मीडिया कंपनियों ने कई कार्यनीतिक विकास किए हैं और प्रिंट, डिजिटल और रेडियो प्लैटफॉर्म बाजारों में विस्तार की पहल की है। अब उन्होंने इन प्रयासों के कार्यान्वयन, एकीकरण और मुद्रीकरण को सुनिश्चित करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।

कमजोर मुद्रास्फीति और कम ब्याज दर के बाद मीडिया क्षेत्र के राजस्व में सुधार की उम्मीद है। केंद्र सरकार द्वारा किए गए महत्वपूर्ण सुधार जैसे निवेश के लिए प्रोत्साहन और कारोबारी माहौल में सुधार से इस क्षेत्र को अधिक लाभ होने की उम्मीद है। उल्लेखनीय रूप से, हाल ही में जीएसटी के आरंभ और क्रियान्वयन से वृद्धि को समर्थन मिलने की उम्मीद है, क्योंकि देश धीरे-धीरे बेहतर कर अनुपालन, प्रशासन और व्यापार करने में आसानी अनुभव करेगा जिससे राष्ट्रीय बाजार एकीकृत होगा।

अगर आँकड़ों पर विश्वास किया जाए, तो वर्ष 2017 में भारत में विज्ञापन पर होने वाले व्यय के 12 प्रतिशत से बढ़कर 61,100 करोड़ रुपए (9.47 अरब अमेरिकी डॉलर) होने की सम्भावना है। मीडिया क्षेत्र से, कोई भी एचटी मीडिया बीएसइ में 1.50 फीसदी , डीबी कॉर्पोरेशन, टीवी 18 बीएसई 0.85 फीसदी, ज़ी एंटरटेनमेंट बीएसई 0.15 फीसदी और डिश टीवीबीएसई 0.75 फीसदी जैसी कंपनियों में एक लंबी अवधि के लिए निवेश करने पर विचार कर सकता है। 

सरकार की उम्मीद

वित्तीय वर्ष के शुरुआती महीनों में हासिल किए गए व्यय की तेज गति को बनाए रखने के लिए, केंद्र सरकार दूरसंचार स्पेक्ट्रम और आरबीआई से लाभांश जैसे कुछ प्रमुख राजस्वों की कमी को देखते हुए प्राप्तियों को बढ़ावा देने के लिए बजट के अलावा अन्य अवसरों की तलाश कर सकती है। वित्त सचिव अशोक लवासा ने बताया है कि भले ही ये प्रारंभिक संकेत हैं कि जीएसटी प्राप्तियाँ मजबूत होंगी और प्रत्यक्ष करों को भी कुछ पोस्ट-डिमॉनेटाईज़ेशन का प्रोत्साहन मिलेगा, वर्तमान वित्त वर्ष में केवल ग्यारह महीनों के जीएसटी प्राप्ति का हिसाब हो सकता है, भले ही जीडीपी की वृद्धि में कमी के कारण राजकोष को नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्रालय यह सुनिश्चित करेगा कि साल 2017-18 के लिए जीडीपी के 3.2 फीसदी के राजकोषीय घाटे की भरपाई हो जाए।

पूर्व जीएसटी शासन काल में, किसी भी महीने के लिए उत्पाद शुल्क और सेवा कर उसी महीने के अंत तक चुकाए जाते थे, जिसका मतलब था कि सभी बारह महीनों का राजस्व उसी वित्तीय वर्ष के खाते में आ जाता था। हालांकि, जीएसटी के तहत, एक महीने के राजस्व का भुगतान अगले महीने में किया जाएगा, जब वास्तव में करों का आकलन कर भुगतान किया जाएगा। इसलिए, अगले मार्च के लिए जीएसटी राजस्व इस साल के बजाए साल 2018-19 के खाते में दिखेगा। लवासा ने आगे बताया कि इसके कारण आए प्रभाव को समझने के लिए हमें एक आकलन करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि लेखांकन अगले वित्तीय वर्ष से स्वयं सही हो जाएगा। एक माह का जीएसटी राजस्व लगभग 1 लाख करोड़ रुपए के बराबर है।

हालांकि वित्त सचिव ने यह नहीं बताया है कि बजट अनुमान से किसी भी संभावित कमी को दूर करने के लिए किन राजस्व क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा और व्यय की गति को बनाए रखने की कोशिश की जाएगी जो निजी निवेश से वंचित अर्थव्यवस्था, अधिक आक्रामक पीएसयू निजीकरण, एसयुयुटीइ के माध्यम से आयोजित निजी कंपनियों में सरकार के होल्डिंग्स को अनलॉक करना और सरकारी भूमि के मुद्रीकरण आदि के लिए संभावित विकल्पों में से एक और बहुत महत्वपूर्ण है। बेशक, ओएनजीसी के एचपीसिएल में मेजोरिटी स्टेक के अधिग्रहण से सरकार को 28,000 करोड़ रुपए या उससे अधिक की प्राप्ति होने वाली है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह उस समय देखा गया था जब 72500 करोड़ रुपए का विनिवेश लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

भारतीय रिजर्व बैंक ने इस साल 58,000 करोड़ रुपए के लाभांश के अनुमान से केवल आधे रुपयों का भुगतान किया है, जबकि दूरसंचार कंपनियों ने स्पेक्ट्रम शुल्क और लाइसेंस शुल्क में बजट के हिसाब से 44,342 करोड़ रुपए का भुगतान करने में कठिनाई जताई है। पिछले साल भी, केंद्र को राजस्व में 98,994 करोड़ रुपए के मूल बजट से स्पेक्ट्रम संबंधित राजस्व को 78,700 करोड़ रुपए तक कम करना पड़ा था।

एफई द्वारा पहले बताया गया था कि सेंट्रल बैंक द्वारा की गई घोषणा की तुलना में वर्ष 2017 के लिए अधिक लाभांश ट्रांसफर करने की संभावना का अन्वेषण करने के लिए सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक में वार्तालाप जारी है। इस महीने की शुरुआत में, आरबीआई ने केंद्र सरकार द्वारा दिए गए 58,000 करोड़ रुपए बजट से, सरकार के वार्षिक लाभांश को 30,659 करोड़ रुपए तक घटा दिया और 2016 में लगभग 65,876 करोड़ रुपए का ट्रांसफर किया है। हमें यह देखना होगा कि वेकौन से राजस्व वाले क्षेत्र हैं, जिनमे कमी आ सकती है और क्या हम इनकी भरपाई कर सकते हैं।

21.47 लाख करोड़ के पूरे साल के लक्ष्य में, केंद्र द्वारा अप्रैल-जुलाई में किए गए 38 फीसदी व्यय से, यह पता चलता है कि केंद्र इस प्रवृत्ति में आगे है। वर्ष 2016-17 के साथ-साथ 2015-16 के इसी अवधि में यह अनुपात लगभग 33 फीसदी था। इस साल, व्यय के बढने का कारण मुख्य रूप से बजट को पहले पास होना है। इससे कई विभागों को सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे पर व्यय करने के लिए अवसर मिलेगा। अप्रैल-जुलाई के दौरान केंद्र की प्रमुख सब्सिडियाँ साल दर साल 42 फीसदी बढ़कर 1.5 लाख करोड़ रुपए हो गई, जबकि पूंजीगत व्यय 33 फीसदी से बढ़कर 95,126 करोड़ रुपए हो गया। इस साल के पहले चार महीनों में समग्र व्यय में 8.08 लाख करोड़ रुपए का निवेश हुआ, जो 23 फीसदी साल दर साल की दर से अधिक है। अप्रैल-जुलाई में केंद्र का सकल कर राजस्व, 11.3 फीसदी के आवश्यक दर के मुकाबले 17 फीसदी साल दर साल के दर से 4.52 लाख करोड़ रुपए रहा। इससे 19 .11 लाख करोड़ रुपए के बजट लक्ष्य को पूरा करने में सहायता मिली। (राज्यों के डिवॉल्यूशन के बाद) केंद्र के लिए शुद्ध कर राजस्व में 19 फीसदी की वृद्धि हुई।

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