मीडिया और मनोरंजन के क्षेत्र पर जीएसटी का प्रभाव

मीडिया और मनोरंजन के क्षेत्र पर जीएसटी का प्रभाव

1 अप्रैल, 2017 से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कानून को लागू करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। भारतीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में जीएसटी परिषद् की एक तीन दिवसीय बैठक आयोजित की गई जिसके पहले दिन परिषद ने सामूहिक रूप से जीएसटी के लिए एक चार-स्तरीय संरचना का प्रस्ताव रखा। सुझाए गए कर ढांचे में 6 प्रतिशत का निम्न दर, 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत के दो मानक दर और विलास और अवगुण मालों के लिए एक अतिरिक्त कर के साथ 26 प्रतिशत का एक उच्च दर शामिल है।

वर्ष 2005 में भारत में जीएसटी बिल के सबसे पहले प्रस्ताव, जिसे संविधान विधेयक 2014 के रूप में भी जाना जाता है, के आने के साथ इसमें बहुत देरी हुई और साथ ही साथ कई बार संशोधन भी हुए। लेकिन, वर्षों के संशोधनों के बाद, अंततः भारतीय संसद द्वारा इस वर्ष अगस्त में इस विधेयक को पारित कि दिया गया और देश भर में सभी लेन-देनों के लिए एक उत्तरदायी एकीकृत कर व्यवस्था बनाने के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया।

वर्तमान भारतीय कराधान प्रणाली के तहत, केंद्र सरकार मूल्यवर्धित कर (वैट) और लेवी आयकर, सीमा शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, सेवा, स्टांप शुल्क, राज्य उत्पाद शुल्क, भू-राजस्व आदि संग्रहित करती हैं। इसके अलावा, राज्य भी अपने करों पर लेवी लगाती हैं, जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। हालांकि, जीएसटी से आरम्भ से जल्द ही एक एकल कर संरचना स्थापित होने वाला है और कई केन्द्र और राज्य करों को समाप्त कर दिया जाएगा। इस प्रस्ताव के अनुसार, अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के तहत सेवाओं के लिए उच्च दर को 18 प्रतिशत किए जाने का प्रस्ताव है, जबकि परिवहन जैसी आवश्यक सेवाओं पर 6 प्रतिशत या 12 प्रतिशत कर लगाया जाना प्रस्तावित है।

अरुण जेटली ने कहा कि इसका व्यापक दृष्टिकोण यह रहा है कि कर दर संरचना ऐसी होनी चाहिए कि अतिरिक्त सीपीआई मुद्रास्फीति न हो, राज्यों और केंद्रों में पर्याप्त राजस्व होना चाहिए ताकि वे अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें और इन सबको कम से कम संभव कर बोझ के साथ मिश्रित किया जाना है, जिसे करदाताओं पर डाला जाना है। यह राजस्व मॉडल कुछ इस तरह का हो, जिसे अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हो सकें, जो राजस्व भुगतान और किसी राज्य को नुकसान होने पर क्षतिपूर्ति भुगतान के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

कर योग्य आधार की लगभग 69 फीसदी पर या तो 18 प्रतिशत, 12 प्रतिशत या 6 प्रतिशत कर लगाया जाना प्रस्तावित हुआ है, जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक चीज़ों पर 12 प्रतिशत या 18 प्रतिशत कर लगाया जाना है। उच्च मूल्यों की गाड़ियों जैसी विलासिता वस्तुएँ और तंबाकू, सिगरेट, वातित पेय आदि अवगुण माल जो कर योग्य आधार के 25 प्रतिशत होते हैं, पर 26 प्रतिशत के उच्च दर से अधिक कर लगाया जाएगा जबकि स्वर्ण पर 4 प्रतिशत का कर लगाया जाना प्रस्तावित है।

जीएसटी की प्रस्तावित कर दर संरचना के तहत, स्वास्थ्य सेवाओं, ईंधन और प्रकाश व्यवस्था और कपड़ों जैसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के घटकों पर मुद्रास्फीति का प्रभाव क्रमशः 0.56 प्रतिशत, 0.05 प्रतिशत और 0.23 प्रतिशत होना अनुमानित है, जबकि परिवहन के लिए इसका (-) 0.65 प्रतिशत, शिक्षा के लिए (-) 0.08 प्रतिशत, आवास के लिए (-) 0.09 प्रतिशत का अनुमान लगाया गया है। 2015-16 के अनुमानों के आधार पर, प्रस्तावित संरचना के अंतर्गत लगभग 8.72 ट्रिलियन भारतीय रुपए (120 बिलियन यूरो) के कुल राजस्व के संग्रहित होने की संभावना है।

अखिल भारतीय व्यापार परिसंघ (सीआईएटी) के अनुसार, जीएसटी व्यवस्था के तहत कई टैक्स दर स्लैब एकल कर व्यवस्था को विकृत कर देंगे और यह जटिलताएँ भी पैदा करेंगे जो स्वैच्छिक अनुपालन को कठिन बना देगा। कई केंद्रीय और राज्य करों के बोझ को दूर करने के लिए जीएसटी एक शक्तिशाली परिवर्तन साबित हो सकता है। टैक्स दरों की असमानताओं और मध्यवर्ती बाधाओं, जिनके कारण कुछ राज्य दूसरों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं, को करों के एकीकरण से दूर किया जाएगा और कम किए गए टैक्स इनवेज़न के साथ माल और वाणिज्य के अंतर-राज्य संचलन तथा अंतर-राज्य कीमतों के अंतर की चुनौतियों को भी समाप्त किया जा सकेगा।

मीडिया पर प्रभाव

जब राज्य सभा ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लिए रास्ता साफ करते हुए संविधान संशोधन विधेयक को पारित कर दिया, जो कि अगस्त माह में किया गया देश का अभूतपूर्व और सबसे बड़ा कर सुधार था, तब इसे उद्योग विशेषज्ञों के द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक खेल परिवर्तक के रूप में माना गया। यह एक ज्ञात तथ्य है कि सरकार को इसे एक वास्तविकता बनाने के लिए कुछ बाधाओं का सामना करना पड़ा है, लेकिन इसकी समग्र प्रतिक्रिया सकारात्मक ही रही है। जब बात मीडिया और मनोरंजन उद्योग की आती है तो इसी सोच को वर्ष 2016 में आयोजित सीआईआई के बड़े शिखर सम्मेलन में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री, एम. वेंकैया नायडू ने दोहराया था। उन्होंने कहा कि वर्तमान में डिजिटल मनोरंजन प्रक्रिया के मूल तत्वों – नेटवर्क, उपकरणों और कॉन्टेंट के अभिसरण को सुनिश्चित करने के लिए मीडिया और मनोरंजन उद्योग को भी एक दृढ़ रूपरेखा तैयार करने की आवश्यकता है।

यहाँ तक कि ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ज़ील) के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पुनीत गोयनका जैसे प्रसारकों को भी यह सकारात्मक प्रतीत हो रहा है। उनके अनुसार, आने वाले वर्ष में जीएसटी के शुभारंभ से टैक्स में संभावित बचत के एक हिस्से के रूप में विज्ञापन खर्च को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आउटगो को पुनर्निवेशित किया जा सकता है। प्रसारकों और रेडियो कंपनियों, जहाँ विज्ञापन आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, के लिए यह ज्यादा चुनौतीपूर्ण नहीं होने जा रहा है क्योंकि यह उनके लेन देन व्यापार से व्यापार प्रकृति के हैं। इसलिए वे अपने विज्ञापनदाताओं से अतिरिक्त टैक्स की वसूली करने के लिए सक्षम रहेंगे। इसके अलावा, कॉन्टेंट निर्माताओं (फिल्म, टीवी और प्रसारकों) के लिए इनपुट क्रेडिट उपलब्ध है, जिससे उत्पादन लागत को कुछ हद तक कम करने में मदद मिलेगी।

अब कराधान के सम्बन्ध में बात करते हैं। वर्तमान में उपभोक्ता टेलीविजन (केबल और डीटीएच), फिल्मों और साथ ही साथ डिजिटल कॉन्टेंट जैसी सभी प्रसारण सेवाओं के लिए 14.5 प्रतिशत से लेकर 15 प्रतिशत तक के बीच सेवा कर का भुगतान करते हैं। इसके अलावा, 8 से 12 फीसदी तक के बीच मनोरंजन पर अतिरिक्त कर लगाया जाता है जिसके परिणामस्वरूप औसत कर में 25 प्रतिशत तक की भी वृद्धि हो जाती है। एक बार जीएसटी क्रियान्वित हो जाए तो, उपभोक्ताओं को केवल एक ही कर का भुगतान करना होगा, जिसके लिए कर दर की संभावना 18 से 20 फीसदी के बीच कहीं भी होगी। इसलिए अंतिम तौर पर उपभोक्ताओं पर लगाया जाने वाला समग्र कर दर काफी कम हो जाएगा।

अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि सेवा कर और वैट के बीच का अंतर भी दूर हो जायेगा। पीडब्ल्यूसी के वरिष्ठ टैक्स पार्टनर, फ्रैंक डिसूजा बताते हैं कि यहाँ वितरण करने के लिए अथवा किसी कॉपी चिह्न का उपयोग करने का अधिकार रखने के लिए कुछ निश्चित लेन-देन संबंधी अधिकार मौजूद हैं। हमेशा से यह एक विवाद रहा है कि क्या यह लेन-देन वस्तुओं के सौदे के लिए किया गया है या फिर सेवाओं के लिए किया गया है। यह प्रासंगिक है, क्योंकि अगर यह लेन-देन वस्तु विनिमय के लिए किया गया है तो वैट लागू होगा और अगर यह विनिमय सेवा के लिए किया गया है, तो सेवा कर लागू होगा। कई बार ऐसी स्थितियाँ भी हुई हैं जहाँ सेवा प्राधिकारियों ने कहा है कि इस पर सेवा कर लगना चाहिए वैट प्राधिकारियों ने वैट की मांग की है। जीएसटी के साथ लंबे समय से चले आ रहे इस बहस का समाधान हो जाएगा क्योंकि तब यह वर्गीकरण मात्र सारहीन बनकर रह जाएगा। चाहे सेवाएँ हों या वस्तुएँ, सभी पर एक ही कर लागू होगा। यह वास्तव में कराधान को कम करेगा। इससे सब प्रकार की मुकदमेबाजी भी दूर हो जाएगी।

वह आगे समझाते हुए बताते हैं कि जब मनोरंजन के कर की बात आएगी तो यह मीडिया और मनोरंजन उद्योग में कैसे काम करेगा। उनके अनुसार, अब जीएसटी के अतर्गत वैट और सेवा कर के बीच जब कोई फर्क ही नहीं है, तो कुछ भी विश्वसनीय है। उदाहरण के तौर पर, एक फिल्म के निर्माण में जो खर्च किए जाते हैं, उस लागत पर कोई सेवा कर या वैट का भुगतान कर सकता है और यह इस आधार पर निर्भर करता है वे किस तरह की सेवा या उत्पाद हैं। आउटपुट ओर से जब वह फिल्म सिनेमाघरों पर मॉनेटाईज़ की जाती है, तब यह सेवा या वैट के लिए उत्तरदायी नहीं है। इनपुट ओर पर, जब आपके द्वारा यह सब खर्चें किए गए हैं, तो आपको इसका पूरा श्रेय नहीं मिल सकता है क्योंकि आपकी आय के एक महत्वपूर्ण भाग पर कर नहीं लगाया जाता है। यहाँ क्रेडिट का नुकसान होता है। जीएसटी के अंतर्गत यह सब चीज़ें दूर होनेवाली हैं, क्योंकि वह सब कुछ जीएसटी के तहत आ जाएगा। आज यह मनोरंजन कर देने के लिए उत्तरदायी है। अब अगर इस राज्य स्तर पर लेवी लगाया जाना है, तो यह भी जीएसटी के अंतर्गत समाहित हो जाएगा। तब कोई अलग मनोरंजन कर नहीं होगा। हालांकि, हमें थोड़ा इंतजार करना होगा और देखना होगा कि यह सब कैसे वास्तविक रूप से संभव हो पाएगा क्योंकि संविधान के तहत स्थानीय निकायों, विशेष रूप से नगर पालिकाओं को उसके ऊपर मनोरंजन कर लगाने का अधिकार है। अगर ऐसा होता है तो शायद यह ठीक नहीं होगा। इससे संबंधित चार या पांच खुले मुद्दें और नियम हैं, जिन्हें अभी भी तैयार किया जा रहा है।

मुफ्त आपूर्ति पर टैक्स लगाने पर चल रहे इस बहस के बारे में बात करते हुए उन्होंने आगे बताया कि यह कैसे मीडिया उद्योग को प्रभावित करेगा। वे कहते हैं कि इससे संबंधित चार या पांच खुले मुद्दें और नियम मौजूद हैं, जिन्हें अभी भी तैयार किया जा रहा है। आपको इसके स्पष्टीकरण के लिए इंतजार करना होगा कि कैसे इसे (नि: शुल्क आपूर्ति पर कर को लेकर विवाद) प्रसारण के क्षेत्र में संबोधित किया जाएगा। आइए इसका एक उदाहरण देखते हैं – जब प्रसारणकर्ताओं द्वारा मल्टी सिस्टेम ऑपरेटरों (एमएसओ) को मुफ्त में सेट टॉप बॉक्स और डीकोडर प्रदान किए जाने की बात आती है ताकि वे सिग्नलों को डाउनलिंक करने में सक्षम हो सकें, तो क्या ऐसी आपूर्तियों पर जीएसटी भारित किया जाना चाहिए? ऐसे कुछ मुद्दे रहेंगे, जिनका समाधान समय के साथ-साथ हो जाएगा। लेकिन कुल समग्र तौर पर, यह थोड़े से जोड़ या घटाव के साथ इस क्षेत्र के लिए सकारात्मक ही होगा। मैं दो चीज़ों का ध्यान रखूँगा कि जब बात विभिन्न स्थानीय निकायों और आपूर्ति के स्थान पर आधारित नियमों की आती है तो, जहाँ तक मनोरंजन कर संबंधित है, लोग क्या करते हैं। अब जब आपूर्ति के स्थान पर आधारित नियम महत्त्वपूर्ण होने जा रहे हैं, यह देखना होगा कि वे आपूर्ति के स्थान पर आधारित नियमों को कैसे परिभाषित करने जा रहे हैं। यह क्या वह जगह है जहाँ  प्रसारक बैठते हैं और सिग्नलों को रिलीज करते हैं या फिर वह जगह है जहाँ प्रत्येक राज्य में एमएसओ संकेतों को एकत्रित करते है? इसी से निर्धारित किया जा सकेगा कि कहाँ इसका अनुपालन किया जाना है।

अर्नेस्ट ऐंड यंग इंडिया द्वारा अर्नेस्ट एंड यंग इंडिया के टैक्स पार्टनर, उदय पिम्परीकर का एक ब्लॉग पोस्ट किया गया है। उस ब्लॉग में यह बताया गया है कि यह कैसे मीडिया और मनोरंजन के क्षेत्र में समग्र त्वरित विकास की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है। पिमपरीकर ने कहा है कि जीएसटी का कार्यान्वयन इस क्षेत्र के लिए दोहरे कराधान, व्यापक करों और अत्यधिक दरों जैसी कई तरह की मौजूदा बाधाओं का समाधान कर सकता है, हालांकि इस क्षेत्र के लिए सकारात्मक परिवर्तन का प्रभाव स्थानीय मनोरंजन करों पर निर्भरशील रहेगा।

पिमपरीकर अपने इस ब्लॉग में विस्तार से समझाते हुए बताते हैं कि मीडिया और मनोरंजन (एम ऐंड ई) क्षेत्र के सभी ईकाइयों में एक समग्र विकास देखा गया है, जो तेजी से बढ़ती आय और उभरती जीवन शैली से प्रेरित है। हालांकि, मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र आपूर्ति श्रृंखला के प्रत्येक स्तर पर अनेक करों से ग्रस्त है, जिसके फलस्वरूप संघ, राज्य और नगर निगम के स्तरों पर टैक्स के अनुपालन को लेकर कर से संबंधित एक जटिल ढांचा तैयार किया जा रहा है। जबकि जीएसटी कई तरह के करों को अपने अंतर्गत समाहित कर देने वाला है और इससे एक राष्ट्र, एक कर, एक मनोरंजन कर के उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जो इस क्षेत्र में अंतिम तौर पर लेवी का गठन करता है, फिर भी क्या इसे नगर निगमों और पंचायतों जैसे स्थानीय निकायों द्वारा लेवी लगाए जाने की सीमा तक लागू किया जा सकता है। अब जब सरकार जीएसटी को कार्यानिवित करने के लिए 1 अप्रैल 2017 की समय सीमा को एक वास्तविक स्वप्न बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही रही है, मीडिया और मनोरंजन सेक्टर इस क्षेत्र में इसे भावी समग्र वर्धित विकास की ओर एक सकारात्मक कदम के रूप में देख रहा है।

उन्होंने आगे और स्पष्ट रूप से समझाते हुए बताया कि यह मल्टीप्लेक्स, फिल्म प्रोडक्शन हाउज़, डीटीएच और केबल सेवाओं सहित कुछ क्षेत्रों को कैसे प्रभावित करने वाला है। डीटीएच और केबल सेवाओं, जो आम तौर पर सेवा कर के दायरें में आते हैं और वृद्धिशील मनोरंजन कर के भी अधीन हैं, के संबंध में पिमपरीकर बताते हैं कि सेवा कर और राज्य स्तर के मनोरंजन कर जीएसटी लागू हो जाने पर वे सब इसमें सम्मिलित कर दिए जाएँगे, लेकिन प्रभावी मनोरंजन कर के भी कम होने की उम्मीद है। उन्होंने चेतावनी देते हुए यह भी कहा कि हांलाकि इन सबके बावजूद कर और राजस्व पर समग्र प्रभाव स्थानीय निकायों द्वारा लगाए गए मनोरंजन कर की मात्रा पर निर्भर करेगा। जीएसटी के इस व्यवस्था के तहत, डीटीएच और केबल सेवा प्रदाताओं के लिए प्रापण पर टैक्स लागत क्रेडिट की बड़ी उपलब्धता के कारण कम होनी चाहिए।

यह मीडिया और मनोरंजन उद्योग पर जीएसटी व्यवस्था के प्रभाव से संबंधित हमारी पिछले कहानी से काफी अलग है। हमने पहले उन विश्लेषकों से बात की थी, जो जीएसटी को लेकर उलझन में या फिर कुछ चिंतित दिख रहे थे। उन्हें लग रहा था कि जीएसटी व्यवस्था के तहत मीडिया कंपनियों के लिए थोड़ा मुश्किलें पैदा हो सकती हैं क्योंकि वहाँ शायद किसी भी प्रकार का केंद्रीय पंजीकरण नहीं होगा।

उन्होंने जीएसटी के दर पर भी बात की, जिसे अभी भी तय किया जाना है। इसे एक जटिल मुद्दे के रूप में माना जा रहा था जो कि वर्तमान राजस्व पर निर्भर करता है। जीएसटी से भी काफी उम्मीदें हैं और इस पर भी काफी कुछ निर्भर करता है। यह कुछ ऐसा है जिसपर कि नियुक्त परिषद द्वारा निर्णय किए जाने की जरूरत है। अब जब कि 1 अप्रैल 2017 की समय – सीमा निकट आ रही है, उसके बाद ही हम इस स्थिति का आकलन करने में सक्षम हो पाएँगे और यह निर्णय कर पाएँगे कि जीएसटी इस क्षेत्र के लिए लाभकारी सिद्ध होगा या नहीं।

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