अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण, स्मार्ट शहरों से लाभान्वित होगी भारतीय अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण, स्मार्ट शहरों से लाभान्वित होगी भारतीय अर्थव्यवस्था

औद्योगिक क्रांति से लेकर हमारे वर्तमान मोबाइल, डिजिटल दुनिया तक प्रौद्योगिकी और नवाचार में प्रगति हमेशा से मानव प्रगति के साथ-साथ ही हुई है। फिर भी, क्या इस प्रगति की विरासत वास्तव में पश्चिमी समाज के लिए बाधा उत्पन्न कर रही है ताकि वह अपना अगला कदम न उठा सके? क्या नवाचार की अगली लहर को लाने में हमें भारत जैसे अधिक स्फूर्तिमान अर्थव्यवस्थाओं से अपेक्षा रखनी चाहिए?

ग्रीनफील्ड शहर

भारत के आधुनिकीकरण और शहरीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाने की दृष्टि से, सरकार ने दो फ्लैगशिप योजनाओं – स्मार्ट सिटी मिशन और अम्रुत (शहरी नवीकरण और रेट्रोफिट्टिंग हेतु) की शुरूआत की है। इस मिशन के अंतर्गत देश भर में 100 शहरों को नागरिक- अनुकूल और संधारणीय बनाते हुए विकसित करना है। इसका उद्देश्य बड़े शहरों के सैटेलाईट शहरों का विकास और मौजूदा मध्यम आकार के शहरों का आधुनिकीकरण है, जिसमें निम्न बातों का ध्यान रखा जाएगा:

  • बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करना और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना
  • उपलब्ध परिसंपत्तियों के कुशल उपयोग के साथ मौजूदा बुनियादी ढांचे का प्रबंधन करना
  • पर्याप्त आर्थिक क्रियाकलापों की पेशकश करना
  • निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ाना

एक नए ग्रीनफील्ड शहर की स्थापना में अपनी ही कई अद्वितीय चुनौतियाँ होती हैं, जिस वजह से स्मार्ट शहर के कार्यान्वयन में परामर्श, विकास, संचालन, वित्त पोषण, और प्रबंधन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञों की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। कार्यान्वयन के बहुत प्रभावी मॉडलों में से एक निजी सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) है, जिसके माध्यम से सरकार परियोजनाओं को विकसित कर रही है। विकासकर्ताओं, डिजाइनरों, सेवा प्रदाताओं, और परामर्शी कंपनियों की तरह कई निजी निवेशकों ने भी इसमें रुचि दिखाई है। इस मिशन को संभव बनाने के लिए निश्चित रूप से हर क्षेत्रों में निजी कंपनियों के लिए विशाल अवसर मौजूद हैं।

स्मार्ट शहरों के मार्ग में प्रमुख चुनौतियाँ

यह जानने के बाद कि शहर विकास के इंजिन हैं और ग्रामीण क्षेत्रों से प्रत्येक मिनट लगभग एक लाख लोगों को आकर्षित कर रहे हैं, सरकार ने राज्यों को योजनाबद्ध शहरीकरण की जिम्मेदारी सौंपते हुए ‘स्मार्ट सिटी चैलेंज’ की शुरुआत की है। स्मार्ट सिटी मिशन के दृष्टिकोण का उद्देश्य उन शहरों को बढ़ावा देना है, जो नागरिकों को प्रमुख बुनियादी सुविधाएँ और जीवन की गुणवत्ता प्रदान करते हैं, एक स्वच्छ और सतत पर्यावरण और ‘स्मार्ट’ समाधान उपलब्ध कराते हैं। वे राज्य, जो दिशा-निर्देशों के अनुरूप खड़े उतरते हैं और शहरों को नामित करते हैं, अगले पाँच सालों के लिए 100 करोड़ रुपए प्रति शहर प्रति वर्ष फंडिंग प्राप्त कर सकते हैं। यह फंडिंग राज्यों के लिए अपने शहरी क्षेत्रों को पुनः जीवंत करने का एक सुनहरा अवसर है, लेकिन स्मार्ट सिटी मिशन की अपनी ही कई चुनौतियाँ हैं। वे चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं।

क्षेत्रीय योजना: शहरी आयोजना प्रत्येक शहर की रीढ़ की हड्डी है, तथापि, जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है, स्मार्ट सिटी योजना एक 1 वर्ष की नहीं बल्कि एक 20 साल से अधिक की योजना है, जिसमें क्षेत्र के समग्र विकास को अधिक महत्व दिया जाता है।

आर्थिक प्रेरक: किसी स्मार्ट सिटी की स्थापना के लिए आर्थिक प्रेरक महत्वपूर्ण होते हैं। कई आर्थिक प्रेरकों पर आधारित शहर के बेहतरीन आर्थिक विकास की एक स्पष्ट योजना स्मार्ट शहर का फोकस क्षेत्र होना चाहिए, खासकर अगर यह एक ग्रीनफील्ड शहर है।

प्रौद्योगिकी क अप्रचलन: भारतीय संदर्भ में, बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों के नियंत्रण से प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारी निवेश की परिकल्पना की जा रही है। जबकि यह निवेश समग्र बुनियादी ढांचे का एक छोटा सा प्रतिशत है, ये सभी निवेश 5 से 10 साल की संभावना के साथ किए जा रहे हैं – और प्रौद्योगिकी इसकी तुलना में काफी तेजी से बढ़ती है। प्रौद्योगिकी एक शहर से अधिक तेजी से विकसित होती है इसलिए प्रौद्योगिकी के बदलाव के साथ ऐडाप्ट करने का विकल्प होना चाहिए।

शहरी गतिशीलता: एक स्मार्ट शहर में कई आयाम शामिल हैं और एक विश्वसनीय, किफायती और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था इसके मूल में है। जन परिवहन प्रणाली के इष्टतम उपयोग के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के साथ-साथ अंतिम मील कनेक्टिविटी का विकास आवश्यक है। अत्यधिक आबादी, मामूली शहरी योजना और निवेश की कमी की वजह से भारत का सार्वजनिक पर्याप्त नहीं रहा है। नए शहरों के निर्माण में सार्वजनिक परिवहन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

जल प्रबंधन: जल चक्र (जल संसाधन, उत्पादन, वितरण, खपत, संग्रह और अपशिष्ट जल का उपचार) किसी शहरी प्रणाली की एक अभिन्न भूमिका निभाता है। नए शहरों में जल और उसकी संधारणीयता बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं।

अपशिष्ट प्रबंधन: ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में संधारणीयता ठोस अपशिष्ट के लिए एक नया दृष्टिकोण लाने और उससे एक संसाधन के रूप में बदलने की मांग करता है। साफ सड़कों और एक स्वस्थ वातावरण के लिए स्मार्ट समाधान के माध्यम से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की जरूरत है। दुर्भाग्य से, भारत इसके प्रति जागरूक नहीं हुआ है।

सामाजिक अवसंरचना: किसी शहर को रहने योग्य बनाने के लिए सामाजिक अवसंरचना की जरूरत होती है। इसका मतलब यह है कि प्रारंभिक वर्षों में, निजी उद्यमों की भागीदारी सीमित रहेगी। इसका यह भी मतलब है कि एक नए ग्रीनफील्ड शहर शुरू करने के लिए, परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा वित्त पोषित करने या रियायती दिए जाने की जरूरत है। नगर नियोजकों को तदनुसार योजना की जरूरत है।

निधि: एक नए शहर में अपेक्षित आर्थिक प्रेरकों और अवसंरचनाओं को विकसित करने के लिए एक लंबा समय लगेगा- उसके बाद ही लोग उसमें कदम रखते हुए दिखेंगे। जब तक कि वह शहर रहने योग्य बनेगा और उसमें एक बुनियादी जनसंख्या होगी, परियोजना के निर्माण में कम से कम 7 से 10 साल लग जाएँगे। दुर्भाग्य से, वर्तमान में इस क्षेत्र के लिए उपलब्ध धनराशि केवल 10-15 साल की छोटी अवधि के लिए ही है। जब तक शहर के विकास के लिए 20 से 30 साल की अवधि के लिए निधि उपलब्ध नहीं होती है, उन परियोजनाओं के सफल होने की संभावना नहीं है। भारत को इन शहरों या उनकी अवसंरचनाओं के वित्तपोषण करने के तरीके में एक बड़ा परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

रोजगार उत्पादक: इन शहरों में रोजगार सृजन पर सरकार के साथ योजना बनाना आवश्यक है। रोजगार सृजन के अंतर्गत न केवल प्राथमिक आर्थिक नौकरियों पर बल्कि सेवा नौकरियों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। उस शहर की सेवा अवलंब अवसंरचना पर काम कर रहे लोगों द्वारा की जानी चाहिए।

चरणबद्धता: एक ग्रीनफील्ड स्मार्ट शहर को निश्चित रूप से वास्तविक मांग के आधार पर चरणों में बनाया जाना चाहिए और उस मांग को बुनियादी बातों से परे जाकर निवेश को प्रेरित करना चाहिए। अन्यथा, हम ऐसे शहरों का निर्माण कर बैठेंगे, जहाँ अवसंरचनाएँ तो होंगी, लेकिन उसका कोई खरीदार नहीं होगा।

रखरखाव: किसी ग्रीनफील्ड शहर का निर्माण अपेक्षाकृत आसान है; हालांकि, वह उसका निरंतर रखरखाव होता है, जो एक महान शहर को अन्य शहरों से अलगाता है।

प्रगति के पथप्रदर्शक

यह न केवल स्मार्ट सिटी को रहने और काम करने के लिए बेहतरीन स्थान बनाता है, बल्कि यह उन्हें आगे के नवाचार और विकास के लिए हॉट स्पॉट बना देता है। भारत विश्व में सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है और उसे उद्यमशीलता और नवीनता पर अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए मान्यता दी जाएगी। अनुमान है कि साल 2050 तक 843 मिलियन लोग भारत के शहरी क्षेत्रों में रहने लगेंगे।

गुजरात: स्मार्ट शहरों के लिए मॉडल राज्य

कल्पना कीजिए कि आप सुबह उठते हैं और ब्लाईंडों को खोलने के लिए स्पर्श पैनल का उपयोग करते हैं। ठीक ऐसा ही लाईट ऑन करने के लिए करते हैं। घर के बाकी हिस्सों में, कैमरे और मोशन सेंसर एक वायरलेस आईटी नेटवर्क को घर के निवासियों की क्रिया का पता लगाने और तदनुसार प्रतिक्रिया करने के लिए अनुमति देते हैं। यह सब एक उच्च तकनीक वाले फिल्म जैसा लगता है? यह कोई मजाक नहीं है; धीरे धीरे अब वे वास्तविकता बन रहे हैं।

इसे ‘स्मार्ट’ प्रौद्योगिकी कहा जाता है और यह थोड़ा-थोड़ा करके भारत में शहरी डिजाइन का एक हिस्सा बनता जा रहा है। प्रमाण के लिए, गुजरात इंटरनैशनल फाइनेंस टेक सिटी (गिफ्ट), यदि सफल हुआ, शहरी जीवन में स्मार्ट प्रौद्योगिकी को मुख्यधारा बनाने का वादा करता है। 78,000 करोड़ रुपए की उच्च तकनीक वित्तीय केंद्र पर कार्य अभी शुरू हुई है और साढ़े तीन सालों में पहले चरण के पूरा होने तक कम से कम एक छोटे पैमाने पर कुछ प्रभावी स्मार्ट प्रौद्योगिकियों को लागू कर दिया जाएगा, जिन्हें भारत में पहले कभी नहीं देखा गया है।

जबकि गुजरात की योजना अत्यधिक महत्वाकांक्षी लग सकती है, यह सच है कि स्मार्ट शहर ही अंततः नागरिक प्रशासकों के लिए द्रुत शहरीकरण का सामना करने का एक ही रास्ता बन सकता है। 2050 तक, दुनिया की आबादी का 70 प्रतिशत से अधिक शहरों में रहना लगेगा।

स्मार्ट शहरों का लक्ष्य है स्मार्ट अर्थव्यवस्था

भारतीय शहरों में शहरी जनसंख्या में हो रही वृद्धि से हर कल्पनीय स्तर पर सामाजिक चुनौतियाँ तीव्र हो जाएँगी। शहरों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और निवेश को आकर्षित करने के लिए, अब सरकारी एजेंसियों के लिए सक्रिय उपाय करना आवश्यक हो गया है। वे अपनी संपत्ति और अवसंरचनाओं का और अधिक कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने को लिए आईसीटी पर अनिवार्य रूप से ज्यादा से ज्यादा निर्भर होंगे। वर्ष 2016 में, भारत सरकार ने 100 नगर पालिकाओं का चयन किया है उनके महत्त्वपूर्ण भागों को ‘स्मार्ट’ शहरों में बदला जा सके।

हाल ही में ‘स्मार्ट शहर’ के विभिन्न स्वतंत्र कार्यों में डिजिटल उपकरणों का अनुप्रयोग किया जाने लगा है। आज के शहर विभिन्न मुद्दों जैसे कि कनेक्टेड मीटर, गैस, पानी या बिजली या यातायात प्रबंधन, भीड़ और पार्किंग के लिए इंटेलिजेंट परिवहन प्रणाली, घर, भवन या एक पूरे क्षेत्र में स्थापित इंटेलिजेंट ऊर्जा प्रबंधन प्रणालियों से लेकर आपातकालीन कॉल के लिए गाड़ी में कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए कनेक्टेड कार आदि और इसी तरह के कई स्मार्ट समाधान के लिए प्रौद्योगिकी की सहायता ले रहे हैं।

जबकि स्मार्ट शहरों से आने वाले वर्षों में सही मायने में क्रांतिकारी होने की उम्मीद की जाती है, विकास और प्रौद्योगिकी ऐडॉप्शन चरण दुनिया भर में भिन्न-भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, यूरोप में, हम पानी, गैस, बिजली, परिवहन, दूरसंचार, जो भली-भांति प्रबंधित और निवेशित है, के लिए स्मार्ट बुनियादी सुविधाएँ देखते हैं। भारत में शहरों के बेहतर प्रबंधन के लिए मौजूदा शहरों में स्मार्ट शहरों के घटक उपयोग में लाए जा रहे हैं।

एक नया परिपक्व पथ

भारत स्मार्ट सिटी कार्यक्रम के मूल में सहयोगी और प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों के साथ, नए विचार उभर रहे हैं और गति से विस्तारित हो रहे हैं। स्मार्ट शहर पारंपरिक पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में निर्मित किए गए कई निश्चित बुनियादी ढांचों और ऐनालॉग प्रणालियों को काफी हद तक दरकिनार करते हुए डिजिटल, मोबाइल और स्वायत्त प्रौद्योगिकियों के चारों ओर अपने विकास को ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। भारत में, 100 स्मार्ट शहरों के निर्माण पर सरकार के फोकस ने इसे एक बहुचर्चित विषय बना दिया है। यह देशों और राज्यों के के लिए इस दिशा में सोचने के लिए एक स्वागत योग्य कदम है और यह डिजिटल अर्थव्यवस्था में बेहतर नागरिक सेवाओं को सुनिश्चित करेगा।

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