आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस : दुनिया बदलने जा रही इस तकनीक को अपनाने के लिए भारत कितना तैयार है?

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस : दुनिया बदलने जा रही इस तकनीक को अपनाने के लिए भारत कितना तैयार है?

हाल ही में सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कहा है कि चीन की तरफ से ख़तरा देखते हुए भारत को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक पर ध्यान देना चाहिए।

कंप्यूटर विज्ञान से जुड़ी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (या एआई) तकनीक को कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ दुनिया के लिए ‘महापरिवर्तन’ का जरिया बता रहे हैं। कहा जा रहा है कि आने वाले समय में लगभग सभी क्षेत्रों में इसी तकनीक से काम होगा। अर्थव्यवस्था के काम इसी के ज़रिए होंगे और मानवीय जीवन काफ़ी हद तक इस पर निर्भर हो जाएगा। हालांकि, अपने शुरुआती दौर में ही यह तकनीक ग़लत इस्तेमाल को लेकर विवादों में भी रही है।

लेकिन ऐसे ख़तरों के बावजूद दुनिया की सबसे मज़बूत अर्थव्यवस्थाएं इसे लेकर हर स्तर पर काम कर रही हैं। अमेरिका व यूरोप के देश जहां इस तकनीक में महारत हासिल करते जा रहे हैं, वहीं चीन ने कुछ समय पहले दो एआई रोबोट एंकरों के ज़रिए बुलेटिन पेश कर दिखा दिया कि एशिया की ओर से वह पश्चिम को टक्कर देने के लिए तैयार है।

वहीं, भारत में कुछ समय पहले तक इस तकनीक को लेकर कोई ख़ास चर्चा नहीं हो रही थी। लेकिन अब दुनियाभर के विकसित देशों में उथल-पुथल मचाने के बाद यहां भी इस पर बात होने लगी है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में इस तकनीक को लेकर कितनी होड़ मची है, उसे सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत के एक हालिया बयान से समझा जा सकता है।

‘भारत को एआई पर ज़ोर देना चाहिए’

बीते पखवाड़े जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि उत्तरी सीमाओं पर हमारा विरोधी (चीन) साइबर युद्ध और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर भारी मात्रा में धन ख़र्च कर रहा है। जनरल के मुताबिक यह इस तकनीक और विस्तृत डेटा विश्लेषण पर ध्यान केंद्रित करने का समय है जिसमें भारत पीछे नहीं रह सकता। उनका आगे यह भी कहना था कि आने वाला समय ज़मीनी युद्ध का नहीं बल्कि साइबर युद्ध का होगा, जिसके लिए भारत को अभी से तैयारी करनी चाहिए और एआई तकनीक पर ज़ोर देना चाहिए।

सेनाध्यक्ष ने जो कहा उसे हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों ने भी समझ लिया है। इसीलिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)- हैदराबाद ने अब अपने यहां एआई विषय संबंधी पूर्ण स्नातक प्रोग्राम शुरू किया है। इस बीटेक कोर्स में छात्रों को एआई तकनीक से जुड़ा गहन अध्ययन कराया जाएगा। अर्थव्यवस्था के तमाम मोर्चों से लेकर सीमा पर देश की सुरक्षा तक में एआई क्या भूमिका निभाने जा रही है, यह सब संस्थान अपने प्रोग्राम के ज़रिए छात्रों को सिखाएगा। भारत में एआई तकनीक के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना इसका एक अहम मक़सद है।

बाकी देशों के मुकाबले भारत कितना तैयार है?

जानकार कहते हैं कि एआई को लेकर सेना और आईआईटी के स्तर पर जो बात हो रही है, उस पर ध्यान देने के साथ यह भी देखा जाना चाहिए इस तकनीक को समझने और अपनाने के लिहाज़ से भारत की स्थिति क्या है।

इस संबंध में इन्फ़ोसिस के पूर्व सीईओ और सह-संस्थापक क्रिस गोपालकृष्णन की शोध एजेंसी ‘इतिहासा’ का विश्लेषण कहता है कि एआई के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शोध प्रकाशित होने के मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। लेकिन चीन के मुक़ाबले वह बहुत ज़्यादा पीछे है। द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2013 से 2017 के बीच भारत में एआई पर किए गए शोध से संबंधित 12,135 दस्तावेज़ प्रकाशित हुए। जबकि, इसी दौरान चीन के 37,918 शोधपत्र दुनियाभर के वैज्ञानिक प्रकाशनों में छपे। यानी इस मामले में वह भारत से तीन गुना आगे है।

वहीं, जब यह देखा गया कि किस शोध को पढ़ने के लिए सबसे ज़्यादा रेफ़रेंस (संदर्भ) दिए गए तो इसमें भारत पांचवें स्थान पर आ गया और चीन व अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और कनाडा भी उससे आगे निकल गए। इस पर ‘इतिहासा’ की रिपोर्ट तैयार करने वालों में से एक एन दयासिंधु कहते हैं, ‘यह बताता है कि भारत को एआई के क्षेत्र में अपने शोध को और बेहतर करना होगा।’ रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में प्रमुख शोधकर्ताओं की संख्या मात्र 50 से 75 के बीच है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि फ़िलहाल सरकार एआई को लेकर उचित समर्थन और फ़ंड मुहैया करा रही है।

एआई की सामान्य समझ के लिहाज से भारत की नई पीढ़ी कितनी तैयार है

चीन अपने यहां स्कूली स्तर पर भी बच्चों को एआई की बुनियादी शिक्षा दे रहा है। जबकि भारत में बड़े पैमाने पर प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर ही फिलहाल अच्छी शिक्षा (सामान्य विषयों की) उपलब्ध नहीं है। सरकारी स्कूलों के पठन-पाठन में उल्लेखनीय सुधार के संकेत अब तक नहीं मिल रहे और लोगों का रुझान निजी स्कूलों की तरफ़ बना हुआ है जिनका पहला मक़सद पैसा कमाना है।

जानकार कहते हैं कि एआई तकनीक की आमद के लिहाज से भी भारत को अपनी इस महत्वपूर्ण समस्या पर ध्यान देना चाहिए। एक रिपोर्ट में तमिलनाडु के गांवों में बच्चों को एआई संबंधी प्रशिक्षण दे रहीं के सुरिया प्रभा कहती हैं कि इस तकनीक के दौर में भारत का भविष्य निराशाजनक दिख रहा है। उनका सुझाव है कि इससे संबंधित पाठ्यक्रम देश के सभी स्कूलों में शुरू किए जाने पर विचार किया जाना चाहिए। प्रभा कहती हैं, ‘अमेरिका के हाई स्कूलों में बच्चों को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पढ़ाई जाती है। चीन ने अपने कस्बों और बड़े शहरों के स्कूलों में इसे पढ़ाना शुरू कर दिया है। भविष्य में यही हुनर चलने वाला है।’

रिपोर्टें देखने पर शंका होती है कि दुनिया बदलने जा रही यह तकनीक कहीं शहरी भारत तक ही सिमट कर न रह जाए। हाल ही में 12वीं एएसईआर (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्रामीण स्कूलों में पढ़ रहे 14 से 18 साल के बच्चे गणित के आसान समीकरण हल नहीं कर पाते। पहले भी ऐसी रिपोर्टें आती रही हैं। इस स्थिति पर एएसईआर रिपोर्ट कहती है कि बुनियादी शिक्षा के ज़रिए बच्चों को ख़ास हुनर के लिए तैयार किया जा सकता है, लेकिन आज भी भारत में 14 प्रतिशत गांव ऐसे हैं जहां कोई स्कूल नहीं है।

भारत में एआई से जुड़े पठन-पाठन और इसे अपनाने के मोर्चे पर बाधाएं और भी हैं

मौजूदा केंद्र सरकार ने साल 2017 में नीति आयोग के तहत एक 15 सदस्यीय टीम बनाई थी। इसे भारत में एआई क्षेत्र की संभावनाओं के बारे में पता लगाने का काम दिया गया था। ख़बरों के मुताबिक़ सरकार यह जानना चाहती थी कि रोज़गार की मौजूदा व्यवस्था के रहते हुए एआई तकनीक को किस तरह अपनाया जा सकता है ताकि इससे नौकरियों को ख़तरा न हो।

टीम ने पिछले साल इस संबंध में एक विस्तृत बयान (डिस्कशन पेपर) जारी किया है। इसमें उन दिक़्क़तों का ज़िक्र किया गया है जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को अपनाने में भारत के लिए बाधक हैं। मसलन, भारत के पास अभी एआई सिस्टम तैयार कर इसे इस्तेमाल करने का हुनर नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक़ देश में सभी एआई पेशेवरों में से केवल चार प्रतिशत ऐसे हैं जिन्होंने डीप लर्निंग और न्यूरल नेटवर्क्स जैसी उभरती व नई तकनीकों पर काम किया है। इसके अलावा यहां इस फ़ील्ड में पीएचडी करने वाले स्कॉलर्स की भी काफ़ी कमी है।

इस बयान में टीम ने कहा कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर काफ़ी पैसा ख़र्च होता है और इस पर काम करने के लिए यहां ज़रूरी कंप्यूटिंग इंफ़्रास्ट्रक्चर भी नहीं है जिसके ज़रिए प्रशिक्षण दिया जा सके और एआई आधारित सेवाएं शुरू हो सकें। इसके अलावा निजी क्षेत्र और सरकारी एजेंसियों को इस तकनीक की पर्याप्त जानकारी नहीं है। उनमें इसे लेकर जागरूकता की कमी है जो इसे अपनाने में एक बड़ी बाधा है।

वहीं, ग्रामीण बच्चों को एआई के बारे में सिखा रहीं प्रभा कहती हैं, ‘एआई पर नीति आयोग की टीम की रिपोर्ट केवल संसाधनों तक पहुंच की बात करती है। लेकिन गांवों में रहने वाले बच्चों का क्या जिनके पास कोई संसाधन नहीं हैं? उन्होंने कभी रोबोट नहीं देखा जिससे पता चले कि वह असलियत में होता क्या है।’

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